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40 साल का तजुर्बा भी हार गया मौत से: कोबरा के डसने के बाद सांप समेत अस्पताल पहुंचे सपेरे की मौत

गोण्डा के ‘सांपों के मसीहा’ राम लखन ने आखिरी सांस तक निभाया फर्ज

गोण्डा के ‘सांपों के मसीहा’ राम लखन ने आखिरी सांस तक निभाया फर्ज

गोण्डा। 40 साल तक सैकड़ों लोगों की जान बचाने वाला ‘सांपों का मसीहा’ खुद को नहीं बचा सका। धानेपुर के श्रीबनकट गांव निवासी मशहूर सपेरे राम लखन की रविवार को कोबरा के डसने के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। मौत से पहले भी उन्होंने इंसानियत की मिसाल पेश की—जहर चढ़ने के बावजूद कोबरा को बोरे में बंद कर अस्पताल ले गए, ताकि वह किसी और को न काट ले।

 

धानेपुर बाजार में हुआ था हादसा

 

रविवार सुबह धानेपुर बाजार में विशाल कोबरा निकलने की सूचना पर राम लखन रेस्क्यू करने पहुंचे थे। चार दशक में सैकड़ों जहरीले सांपों को सुरक्षित पकड़ चुके राम लखन का इस बार तजुर्बा धोखा दे गया। रेस्क्यू के दौरान कोबरा ने फन फैलाकर उनके हाथ पर डस लिया।

 

‘किसी और की जान न जाए’ और सांप को कर लिया कैद

 

जहर फैलते ही हालत बिगड़ने लगी, मगर राम लखन ने हौसला नहीं खोया। परिजनों ने बताया कि दर्द से कराहते हुए भी वह बोले—“अगर इसे यहीं छोड़ देता तो बाजार में किसी और को काट लेता।” उन्होंने फुर्ती से कोबरा को बोरे में बंद कर दिया और परिजनों के साथ जिला मेडिकल कॉलेज भागे।

 

इमरजेंसी में बगल में था जिंदा कोबरा

 

जिला मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में उस वक्त हड़कंप मच गया जब स्टाफ को पता चला कि स्ट्रेचर पर लेटे मरीज के बगल में रखे बोरे में जिंदा कोबरा है। डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया, एंटी वेनम दिया, मगर तब तक देर हो चुकी थी। इलाज के दौरान राम लखन ने दम तोड़ दिया।

 

‘पहले लोगों की सुरक्षा, फिर अपनी जान’

 

स्थानीय लोगों का कहना है कि सांप के डसने के बाद भी राम लखन ने सबसे पहले भीड़ की सुरक्षा सोची। उनका यह बलिदान पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। 40 साल में उन्होंने सैकड़ों जहरीले सांपों को आबादी से निकालकर जंगल में छोड़ा, एक भी हादसा नहीं हुआ था। रविवार को पहली बार किस्मत ने दगा दिया और आखिरी बार भी।

 

अस्पताल प्रशासन-

“मरीज को जब लाया गया तब जहर काफी फैल चुका था। हमने पूरी कोशिश की, लेकिन बचा नहीं सके। उनका जज्बा देखकर पूरा स्टाफ भावुक हो गया।” 

 

राम लखन ने 40 साल तक मौत से खेलकर दूसरों की जिंदगी बचाई। आखिरी वक्त में भी जब मौत सामने थी, तो पहले दूसरों की फिक्र की। वह चले गए, मगर ‘इंसानियत पहले’ का सबक दे गए। धानेपुर की गलियां आज सूनी हैं, क्योंकि ‘सांपों का मसीहा’ अब कभी नहीं लौटेगा। प्रशासन से मांग है कि राम लखन के परिवार को आर्थिक मदद और उनके काम को सम्मान दिया जाए।

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